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India... az India!

Már egy ideje Indiával kelek és fekszem. Volt már néhányszor, hogy Indiában keltem és feküdtem. Reméltem, nem kell sokat várni, hogy újra így legyen. És itt vagyok újra :) A blog régebbi bejegyzései közt megannyi útleírást, az újabbak között véleményeket, kultúrtörténeti és irodalmi írásokat, fordításokat is talál a Kedves Olvasó. Őszintén remélem, úgy érzik majd, nem sok másik olyan forrás akad, amely ilyen rálátást kínál napjaink Indiájára.

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2015. június 02. पेतॅर

खोई-पाई हिन्दी

Hindíül is olvasóknak.

मज़े की बात यह है कि जाँच-पड़ताल और पहले से लोगों की राय पूछे बिना मैं यह तक नहीं बता सकता कि अगर एफ॰डी॰ बनाई जाती है तो टी॰वी॰ और ए॰सी॰ भी बनने के बाद चलती क्यों नहीं है, वह क्यों चलता है। मेरे रास्ते में और कई ऐसे गड्ढे पड़े हैं, हर समय औंधा पड़ जाने का खतरा है। हालाँकि अंग्रेज़ी और कई सारी अंग्रेज़ी से पहले की भारतीय शब्दावली के स्त्रीलिंग-पुल्लिंग होने पर फैसला लेने की स्थिति में पूर्वाञ्चल वगरह के बहुतेरे लोग भी नहीं होंगे, बावजूद इसके कि मैथिली, मगही, अंगिका आदयः उनकी बोली कहलाई जानेवाली भाषाओं को भी ‘सुविधा’ के लिए ‘हिन्दी’, इस सर्वग्राही, सर्वाच्छादी, सर्वछेदी और सबसे अव्वल – सरकारी मायनों में आरामदेह लफ्ज़ से पुकारा जाता है। फिर लुगाई की बात कौन करै।

मेरी हिन्दी वाक्य-रचना एक लिखित पन्ने में एकाध – यानी एक या आधी, या दो-तीन या फिर कभी उससे भी ज़्यादा – बार गड़बड़ा तो जानी है। तब हिन्दी के जानकार मुझसे कहेंगे, लो पीटर इसमें तुम्हारी अंग्रेज़ी घुस गई है। यद्यपि पेतॅर ने अंग्रेज़ी में बस खाना-पीना जाना है, बोलना-विचारना हंगेरियन में होता है – ज़्यादातर। मुझे प्यार से समझाया जाता है, देखो हिन्दी में ऐसा नहीं होता, यह ऐसे होगा। फिर कि अब यहाँ ‘ऐसे’ नहीं होगा, ‘ऐसा’ ही होता है। इधर से काटा, उधर डाल दिया, यहाँ सुधारा, वहाँ मैं भूल गया। ‘की’ के ‘का-के-की’ का भय इतना कि इसका बीमा बनेगा ही नहीं, मैं लुटा हुआ खड़ा हूँ सर खुजाते हुए : अब मेरी पल-पल की मेहनत का चारों ओर फैला कचूमर कौन समेटे ?

और बावजूद इस पूरी पंचायत के मैं इतनी भयंकर हिम्मत रखता हूँ कि जिसके आगे कोई ‘हिम्मतवाला’ भी पानी भरे। इतनी हिम्मत कि हिन्दी कैसी होनी चाहिए, इस विषय में एक हिन्दुस्तानी को, आप सभी को सुनाऊँ। अपना सलाह-मशवरा। मशवरे में आपका मन टटोलने और एक-दूसरे का दिल खोलने की आत्मीयता है, तो सलाह में मेरा सद्भाव। पर अगर ऊपर बताए कारणों से और ऊपर से अनजान व्यक्ति से आप ऐसे मुँह उठाके उसकी बात छाती से बाँधने का ‘रिस्क’ नहीं ले सकते, इतनी जोखिम नहीं उठा सकते, तो अब कान बन्द करके आगे सुनिए। या सुनिए भी नहीं।

मैं यह मानता हूँ कि ‘अच्छी’ हिन्दी हमारे आस-पास है, केवल उसे ताड़ पकड़ने की देर है। खोजने से तो भगवान् भी मिल जाता है, फिर यह ‘अच्छी’ हिन्दी कैसे नहीं मिलेगी ? ‘मानक’ का मनका खो गया, तो कोई बात नहीं, बल्कि बेहतर भी है, खाँटी मोती मिलेगा उसके बदले !

हिन्दी है ही क्या ? मतलब हिन्दी है ही क्या चीज़ ? – दो कौड़ी के भरत-वंशज अंग्रेज़ी में पूछते हैं। पर मैं इस बुनियादी सवाल से छिपके रहूँगा कि हिन्दी है ही क्या। यानी हिन्दी है क्या। उसका स्वभाव और लच्छन किसने देखे हैं ? तो बहुत-से जनों से पता करने पर जान पड़ता है, श्वेतकेतु की नोन की डली की तरह हर जगह होने के बावजूद हिन्दी हिन्दुस्तान से गायब ! कोई कहे मैंने तो बस मारवाड़ी जानी है, हमने अवधी ही, मैं सिर्फ पंजाबी, कोई कहे फ़क़त उर्दू, कोई यह कि केवल संस्कृत, फिर कोई कि हिंगलिश ‘ऑनली’। मौके पे बोलते तो सब यही हैं। हाँ, इक्का-दुक्का तो खड़ी बोली भी जानते हैं। दिल्ली के आस-पास, मेरठ तक। पर उसमें इत्ती बड़ी दिल्ली कहीं नज़र नहीं आती। या है भी, पर उतनी नहीं। आजकल कुछ पता नहीं चलता।

अपनी-अपनी बोली बोलते, धुन बजाते, राग अलापते लोगों के मेले में खोई हुई हिन्दी को किस नाम से पुकारें कि वह मिल जाए ?

मज़े की बात यहाँ तक। अफ़सोस यह है कि ऐसे आपको हिन्दी नहीं मिलनेवाली। वह कोई एक अकेला इनसान नहीं है। जब करोड़ों की आबादी पर मढ़ा हुआ हिन्दी का गढ़ा मानक नायलॉन के पतले वरक-सा फटता है, तब पता चलता है। फटता तो कई जगहों से है। किसी ठेठ सेठ करोड़पति – करोड़ों लोगों के अधिपति – के महँगे विदेशी जूते की नोक से भी, मंदिर-मस्जिद की गोलाई पर लहराते झंडे की नोक से, बाहर के सपाटे किये हुए या जल्द ही जा रहे बाशिन्दों की वीजा-फॉर्म भरती कलम की नोक से क्यों नहीं। रह जाती है कोरी वास्तविकता ‘ऑनली’।

अब ऐसे कैसे पता चलेगा कि हिन्दी कैसी होनी चाहिए ?

अगर अभी तक की सतरें आपको समझ आ गईं, तो अब इन्हें फिर से पढ़िए, पर इस बार शब्दावली पर ज़रा ध्यान दीजिए। तब जानेंगे आप कि यहाँ कुछ भी यूँ ही नहीं है। आई बात समझ में ? मैं कहता हूँ, ऐसी होनी चाहिए हिन्दी, जितनी हो सके सब को आसानी से समझ आनेवाली। हाँ, इतना तो है कि लगता है, इसमें खड़ी बोली की मिट्टी की खुशबू ही तनी ज़्यादा है, गाँव वाली। बची हुई खुशबुओं को भी इससे क्या हर्ज़ है, यह दिल्ली का आस-पड़ोस है ही इतना छोटा, ख़ासकर जब उसमें दिल्ली जैसे है ही नहीं। आस तो फिर भी रहेगी, यह खुशबू इस मिट्टी से उठकर और कहीं भी फैलेगी, खोज-ग्रन्थों और सालाना बही-बिठान रिपोर्टों के लेखकों से व्हाट्सएप-नामा के कलाकारों तक को साथ खींचेगी।

बस।

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