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India... az India!

Már egy ideje Indiával kelek és fekszem. Volt már néhányszor, hogy Indiában keltem és feküdtem. Reméltem, nem kell sokat várni, hogy újra így legyen. És itt vagyok újra :) A blog régebbi bejegyzései közt megannyi útleírást, az újabbak között véleményeket, kultúrtörténeti és irodalmi írásokat, fordításokat is talál a Kedves Olvasó. Őszintén remélem, úgy érzik majd, nem sok másik olyan forrás akad, amely ilyen rálátást kínál napjaink Indiájára.

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2016. november 30. पेतॅर

#demonetisation (के रूप और रंग-रूप)

परसों रात 1.20 को मुझे अमृतसर से पठानकोट के लिए गाड़ी पकड़नी थी। पास ही है। टिकेट खिड़की पर महिला ने बताया कि टिकेट आधी रात के बाद निकलेगी। ठीक है भई। तब मैंने ध्यान भी नहीं दिया था, काउंटर के इलाके में कितने लोग सो रहे हैं गठरी बनकर। मौसम सर्द होने लगा है, ख़ासकर रातों को। प्लेटफार्म की ओर बढ़ते हुए एक कर्कश, कड़ी, कराहती हुई आवाज़ ने मेरे पीछे कहा, 'अंग्रेज वाले बाबू, एक चाय तो पिला दे'। उस आवाज़ को शक नहीं था कि दूसरा सुन रहा है। मैंने प्रतिक्रिया नहीं दी। इससे अच्छा था, मैं खुद कुछ खा लूँ, फिर थोड़ी देर सो जाऊँ।

सवा 12 बजे तन्द्रा टूटी और काउंटर पर पहुँचा, तब देखा कि पहले जो सो रहे होंगे, अब अधिकांश जाग उठे और काउंटर के सामने टेढ़ी कतार में लग गए। मैं भी। सब लिपटकर खड़े थे, जिससे मुझे हमेशा गुस्सा आता है। चिढ़ से बाकी की नींद भी भाग खड़ी हुई। कंधे के ऊपर से मुड़कर देखा। दबे रंग का एक लड़का अथवा युवक अपनी साँसें मेरी पीठ के बीच में छोड़ रहा था। अचानक समझ में आया कि ये सब, यानी सब के सब, आर-पार दिहाड़ी मज़दूर हैं। गठरी-गठरी पंजाब से अपने दूर गृह-प्रदेश के गृह-ग्राम के लिए रवान है। लाइन में सबसे आगे दो पग्गड़ टिकेट के साथ लौट रहे थे, ऐसे मज़हबी सिक्ख किस्म के। कमाल है, और कोई है ही नहीं, मैंने सोचा।

फिर गहरी चिन्ता में पड़ गया। और किसकी तलाश थी आखिर। एकदम से ऐसा क्या अलग लगा? सच बात यह है कि मुझे कहीं न कहीं ऐसे किसी बन्दे की तलाश रही होगी, जिससे मैं अगर हिन्दी मैं कहूँ कि लो, बोलो, क्या स्यापा है यह, तो वह भी कहे, बताओ जी। ऐसे लोगों के बीच मुझे अपना विदेशी होना ज़्यादातर भूल जाता है। आजकल इतने सवाल भी नहीं पूछते। शक्ल व सूरत का थोड़ा-सा फेर है। रंग भी इतना मैटर नहीं करता। हिंदुस्तान के हर फेसवॉश में सफेदी है। फिर मैं अपना फेसवॉश घर से लाता हूँ।

पर बात तो यह है कि मैं उस लाइन में पराया था। अ-लग। भाषा सीखकर, कपड़े पहनकर जिस समाज से खुद को अलग न समझना मेरी रोज़ की ज़िद्द है, ठेठर, अब कहाँ गया वह समाज? मुझे यकीन था कि मैं कश्मीर से कन्याकुमारी तक, शहर से गाँव तक सब कुछ देख-परख चुका हूँ। ऐसे में उस रैन-बसेरानुमा प्लेटफार्म के परायेपन और असादृश्य ने मुझे झकझोर दिया। कहाँ थे ये दूसरे लोग कि वे तब नज़र आए, जब अपने ख़ालिस अनमेल बाहुल्य से यकायक अपनी उपस्थिति (मेरे मस्तिष्क में) दर्ज़ की? क्या और भी होंगे इस देश में? आपने इन्हें कभी देखा है?

A hindíül nem olvasóknak ezt a két indiai himnusz-videót ajánlanám, bár még ezekben sem a legszerencsétlenebb napszámosokat mutatják be, akikről fentebb írtam egy pár szót. A társadalom java nincs abban a megbecsült helyzetben, hogy bele tudhatna szólni az országa és saját sorsának alakulásába.

A másikat is Mumbaíban vették fel. Érdemes rákattintani, bár itt nem jelenik meg kép. 

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Címkék: india wage worker दिहाड़ी मज़दूर demonetisation


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